Wednesday, 21 August 2019

मगध साम्राज्य के उदय

Rise of Magadha Empire

मगध साम्राज्य की उत्पत्ति उस समय हुई थी जब 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व से 4थी शताब्दी ई.पू. तक चार महाजनपद मगध, कोशल, वत्स और अवंती एक-दूसरे के ऊपर वर्चस्व स्थापित करने के लिए संघर्ष में लगे हुए थे| अंततः मगध उत्तर भारत में सबसे शक्तिशाली और समृद्ध साम्राज्य के रूप में उभरा|

मगध साम्राज्य के संस्थापक “जरासंध” और “बृहद्रथ” थे लेकिन इसका विकास “हर्यक” वंश के समय में शुरू हुआ था, जबकि इसका विस्तार “शिशुनाग” एवं “नंद” वंश के समय हुआ था| अंततः “मौर्य” वंश के शासनकाल में मगध साम्राज्य अपने सर्वोच्च मुकाम पर पहुँच गया था|

सोलह महाजनपद और उनकी राजधानी (Part -2)

sixteen-mahajanapadas-and-their-capitals-part-2


9. कुरु (Kuru)
उत्तर वैदिक साहित्य में इस जनपद के पर्याप्त विवरण प्राप्त होते हैं। इसके थानेश्वर (हरियाणा राज्य में) दिल्ली और मेरठ का क्षेत्र सम्मिलित थे। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ (हस्तिनापुर) थी।

10. पंचाल (Panchal)
यह जनपद उत्तर वैदिक काल में ही प्रसिद्ध था। इसमें वर्तमान रूबेलखंड और उसके समीप के कुछ जिले सम्मिलित थे। इसके दो भाग थे – उत्तरी पंचाल और दक्षिणी पंचाल। उत्तरी पंचाल की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिणी पंचाल की राजधानी काम्पिल्य थी। मूलतः यह जनपद एक राजतंत्र था लेकिन संभवतः कौटिल्य के काल में यहाँ गणतंत्रीय शासन व्यवस्था हो गयी।

11. मत्स्य (Matsya)
इस जनपद में आधुनिक राजस्थान राज्य के जयपुर और अलवर जिले शामिल थे। विराट नगर संभवतः इसकी राजधानी थी। सम्भवतः यह जनपद कभी चेदि राज्य के अधीन रहा था।

12. शूरसेन (Shursen)
मथुरा और उसके आसपास के क्षेत्र इस जनपद में शामिल थे। आधुनिक मथुरा नगर ही इसकी राजधानी था। बौद्ध ग्रन्थों में अयन्तिपुत्र शूरसेन राज्य का उल्लेख मिलता है। वह बौद्ध धर्म का अनुयायी और संरक्षक था।

13. अस्सक या अस्मक (Assak)
यह राज्य गोदावरी नदी के किनारे पर स्थित था। पाटेन अथवा पोटन इसकी राजधानी थी। पुराणों के अनुसार इस महाजनपद के शासक इक्ष्वाकु वंश के थे। जातक कथाओं में भी इस जनपद के अनेक राजाओं के नामों की जानकारी मिलती है।

14. अवन्ति (Avanti)
अवंति राजतंत्र में लगभग उज्जैन प्रदेश और उसके आसपास के जिले थे। पुराणों के अनुसार पुणिक नामक सेनापति ने यदुवंशीय वीतिहोत्र नामक शासक की हत्या करके अपने पुत्र प्रद्योत को अवन्ति की गद्दी पर बैठाया। इसके अंतिम शासक नन्दवर्धन को मगध के शासक शिशुनाग ने पराजित किया और इसे अपने साम्राज्य का अंग बना लिया। यह महाजनपद दो भागों में विभाजित था। उत्तरी भाग की राजधानी उज्जयिनी और दक्षिणी भाग की राजधानी महिष्मति थी।

15. कम्बोज (Kamboj)
यह राज्य गांधार के पड़ोस में था। कश्मीर के कुछ भाग जैसे राजोरी और हजार जिले इसमें शामिल थे। संभवतः राजपुर या हाटक इसकी राजधानी थी।

16. गांधार (Gandhar)
इस जनपद में वर्तमान पेशावर, रावलपिण्डी और कुछ कश्मीर का भाग भी शामिल था। तक्षशिला इसकी राजधानी थी। गांधार का राजा पुमकुसाटी गौतम बुद्ध और बिम्बिसार का समकालीन था। उसने अवंति के राजा प्रद्योत से कई युद्ध किए और उसे पराजित किया। इसकी राजधानी विद्या का केंद्र था। देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते थे।

सोलह महाजनपद और उनकी राजधानी (Part -1)

Sixteen Mahajanapadas and their Capital (Part-1)

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में उत्तर भारत में अनेक विस्तृत और शक्तिशाली स्वतंत्र राज्यों की स्थापना हुई, जिन्हें महाजनपदों की संज्ञा की गई | बौद्ध ग्रन्थ “अगुत्तरनिकाय” के अनुसार उस समय 16 महाजनपद सम्मिलित थे |

1. अंग (Ang)
यह महाजनपद मगध राज्य के पूर्व में स्थित था। इसकी राजधानी चंपा थी। आधुनिक भागलपुर और मुंगेर का क्षेत्र इसी जनपद में शामिल था। गौतम बुद्ध के समय में इस राज्य का मगध के साथ संघर्ष चलता रहा। संभवतः प्रारभ में अंग ने कुछ समय के लिए मगध को पराजित कर अपने में शामिल कर लिया। लेकिन शीघ्र ही इस जनपद की शक्ति क्षीण हो गयी और बिम्बिसार नामक शासक ने न केवल मगध को अंग से स्वतंत्र कराया बल्कि उसने अंग को भी अपने अधीन किया। कालांतर में यह राज्य मगध राज्य का ही हिस्सा बन गया।

2. मगध (Magadh)
बौद्ध साहित्य में इस राज्य की राजधानी (गिरिव्रज या राजगीर) और निवासियों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। वर्तमान पटना और गया जिलों के क्षेत्र इसके अंग थे। अथर्ववेद में भी इस राज्य का उल्लेख है।

3. काशी (Kashi)
इसकी राजधानी वाराणसी (बनारस) थी। काशी के कौसल, मगध और अंग राज्यों से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे और प्रायः उसे उसने संघर्षरत रहना पड़ा। गौतम बुद्ध के समय में काशी राज्य का राजनैतिक पतन हो गया।

4. वृज्जि या वज्जि संघ (Vajji)
यह महाजनपद मगध के उत्तर में स्थित था। यह संघ आठ कुलों के संयोंग से बना और इनमें चार (विदेह, ज्ञातृक, वज्जि और लिच्छवि) कुल अधिक प्रमुख थे। विशाल इस संघ की राजधानी थी।

5. कोसल (Koshal)
इन जनपद की सीमाएँ पूर्व में सदानीर नदी (गण्डक), पश्चिम में पंचाल, सर्पिका या स्यन्दिका नदी (सई नदी) दक्षिण और उत्तर में नेपाल की तलपटी थी। सरयू नदी इसे (कोसल जनपद को) दो भागों में विभाजित करती थी। एक उत्तरी कोसल जिसकी राजधानी श्रावस्ती थी और दूसरा दक्षिणी कोसल, जिसकी राजधानी कुशावती थी।

6. मल्ल (Malla)
यह जनपद वज्जि संघ के उत्तर में स्थित एक पहाड़ी राज्य था। इसके दो भाग थे जिनमें एक की राजधानी कुशीनगर (जहाँ महात्मा बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ) और दूसरे भाग की राजधानी पावा (जहाँ वर्धमान महावीर को निर्वाण मिला) थी।

7. चेदि (Chedi)
यह महाजनपद यमुना नदी के किनारे स्थित था। यह आधुनिक बुन्देलखंड के पूर्वी भाग और उसके समीपवर्ती भूखंड में फैला हुआ था। महाभारत के अनुसार “शुक्तिमती” इसकी राजधानी थी लेकिन “चेतियजातक” के अनुसार “सोत्थिवती” इसकी राजधानी थी। महाभारत के अनुसार शिशुपाल यहीं का शासक था।

8. वत्स (Vatsa)
काशी के पश्चिम भाग में प्रयाग के आसपास क्षेत्र में यह जनपद स्थित था। कौशाम्बी इसकी राजधानी थी। बुद्ध के समय में इसका शासक उदयन था।

सोलह महाजनपद और उनकी राजधानी (Part -2)

महाजनपद का निर्माण कैसे और किस रूप में हुआ ?

Rise of Mahajanapada

भारतीय इतिहास में आर्थिक और राजनैतिक विकास की दृष्टि से ईसापूर्व छठी शताब्दी का समय बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस समय सिंधु घाटी सभ्यता का पतन हो रहा था और भारत में शहरी सभ्यता के उदय के साथ ही बौद्ध और जैन धर्मों का भी आविर्भाव हो रहा था। इस समय में लिखे गए बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार अर्ध-बंजारा जनजाति स्वयं को कृषि आधारित समाज में ढालने का प्रयत्न कर रही थी। इसके साथ ही व्यवस्थित राजनैतिक तंत्र और विस्तृत व्यापारिक तंत्र के कारण विभिन्न राज्यों का उदय हुआ और इन्हें व्यक्तिगत रूप से ‘जनपद’ व सामूहिक रूप से ‘महाजनपद’ का नाम दिया गया।

सभी जनपदों के नाम उस स्थान पर बसी क्षत्रिय जाती के आधार पर दिये गए थे। इन जनपदों की सीमाओं का निर्धारन नदियों , जंगलों या पर्वत श्रंखलाओं जैसे हिमालय के आधार पर किया गया था।  इतिहासकारों का इन जनपदों की संख्या को लेकर मतभेद है। 

जैसे पाणिनी के अनुसार इन निर्मित जनपदों की संख्या 22 है जबकि बौद्ध ग्रन्थों -अंगुतर निकाय, महावस्तु  के अनुसार 16 है। लेकिन एक बात में सभी एकमत हैं कि इन सभी में मगध, कोसल और वत्स महत्वपूर्ण जनपद माने जाते थे।

सभी 16 जनपदों की अपनी एक राजधानी होती थी जिसके लिए एक सुदृढ़ किले का निर्माण किया जाता था। इस किले की देखभाल एक प्रशिक्षित सेना द्वारा किया जाता था। जनपद के मुखिया या शासक द्वारा सेना और प्रशासन के रखरखाव के लिए जनता से कर के माध्यम से धन प्राप्त किया जाता था।

महाजनपद काल का इतिहास

Mahajanapada period-History of Mahajanapada period

महाजनपद काल (Mahajanapada period)(600 BC - 345 BC) 

वैदिक काल में जनजाति जो एक समूह में रहते थे, उन्होनें अपने अलग-अलग राज्य सीमाओं को निर्धारित करने का निश्चय किया। इस प्रकार छठी शताब्दी ईसा पूर्व में इसी निश्चय ने जिन इकाइयों को जन्म दिया उन्हें जनपद या राज्य का नाम दिया गया। बौद्ध ग्रन्थों में इन जनपदों के बारें में बहुत कुछ लिखा गया है।

महाजनपद शब्द वास्तव में संस्कृत के शब्द ‘महा’ और ‘जनपद’ के संयोग से मिलकर बना है जहां ‘महा’ का अर्थ है ‘बहुत बड़ा’ और ‘जनपद’ का अर्थ है ‘एक जनजाति के पदचिन्ह’।

इस प्रकार यह जनपद वर्तमान काल के उत्तरी अफगानिस्तान से लेकर बिहार तक और हिंदुकुश से लेकर गोदावरी नदी के विस्तार तक फैले हुए थे। इन जनपदो का विवरण रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलता है।

बौद्ध और जैन धार्मिक ग्रन्थों से पता चलता है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी का भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था. उस समय उत्तरी भारत में सोलह महाजनपद (Sixteen Mahajanapada) अर्थात् बड़े राज्यों का अस्तित्व था. ये राज्य बड़े राज्य इसलिए कहलाते थे क्योंकि इनका आकार वैदिक युगीन कबीलाई राज्यों से बड़ा था. कबीलाई राज्यों के स्थान पर महाजनपद (या जनपद राज्य) इसलिए बने क्योंकि लोहे के प्रयोग के कारण युद्ध अस्त्र-शस्त्र और कृषि उपकरणों द्वारा योद्धा और कृषक अपने-अपने क्षेत्रों में अधिक सफलता पा सके.

उत्तर वैदिक कालीन की सामाजिक दशा

Social condition of Post Vedic period

उत्तर वैदिक काल (Social condition of Post Vedic period) में आर्यों की सामाजिक व्यवस्था का आधार वर्णाश्रम व्यवस्था थी यद्यपि वर्ण व्यवस्था की नींव ऋग्वैदिक काल में ही पड़ गयी थी परन्तु वह स्थापित उत्तर-वैदिक काल में ही हुई। 
  • समाज में चार वर्ण ब्राहमण, राजन्य, वैश्य और शूद्र थे। इनमें ब्राहमणों की प्रतिष्ठा सर्वाधिक थी। ऋग्वैदिक काल में कुल सात पुरोहित थे। उत्तर वैदिक काल में उनकी संख्या बढ़कर 17 हो गई इनमें ऐसे पुरोहित जिन्हें ब्रम्ह का ज्ञान होता था वे ब्राहमण कहलाये इनका मुख्य कार्य यज्ञ और अनुष्ठान था
  • दूसरा वर्ण राजन्य था ऐतरेय ब्राहमण से पता चलता है कि इसकी स्थिति ब्राहमणों से श्रेष्ठ थी।
  • वैश्व वर्ण की उत्पत्ति विश् शब्द से हुई समाज का यही वर्ग कर देता था इसीलिए इसका नाम अनस्यबलकृत भी पड़ गया।
  • शूद्रों की दशा समाज में निम्न थी उसका कार्य अन्य वर्गों की सेवा करना था उत्तर-वैदिक काल में इस वर्ण का उपनयन संस्कार बन्द कर दिया गया जिससे उसकी सामाजिक दशा का हास हुआ। उसके कुछ अन्य नाम पड़ गये जैसे- अनस्यप्रेष्य: (अन्य वर्णों का सेवक) कामोत्थाप्स (मनमाने ढंग से उखाड़ फेंके जाने वाले) यथा काम बध्य (इच्छानुसार वध किया जाने वाला) इससे पता चलता है कि समाज में इनकी दशा गिर रही थी।
  • इस समय समाज में एक अन्य वर्ग रथकार का स्थान महत्वपूर्ण था इसका भी उपनयन संस्कार ऊपर के तीन वर्णों की भाँति होता था।

उत्तर वैदिक कालीन की राजनैतिक दशा

post rig veda period

उत्तर वैदिक काल (Post Rig Veda Period)(1000-600 ई. पू. ) में छोटे-छोटे जन् आपस में मिलाकर एक बड़ी इकाई जनपद में परिवर्तित हो गये। ऐतरेय ब्राह्मण में पहली बार राष्ट्र शब्द का उल्लेख भी मिलता है।
 
उदाहरणार्थ पुरु भारत – कुरु एवं तुर्वश और क्रीवि मिलकर पांचाल हो गये। इस प्रकार राजा की महत्ता में वृद्धि हुई। राजा ने इसका फायदा उठाया और अपने पर से सभा और समिति के नियन्त्रण को समाप्त कर दिया। उत्तर-वैदिक काल में सर्वप्रथम समाप्त होनी वाली संस्था विद्थ थी। 

इस काल में राजा अलग-अलग उपाधियां धारण करने लगे। उदाहरणार्थ-मध्यदेश के राजा को राजन, पूर्व देश के राजा को सम्राट पश्चिम के राजा को स्वराट और उत्तर के राजा को विराट एवं दक्षिण के राजा को भोज कहा गया जो राजा इन चारों दिशाओं के राजाओं को जीत लेता था उन्हें एकराट कहा जाता था। उत्तर वैदिक काल में कौशांबी नगर में पहली बार पक्की ईंटों का इस्तेमाल हुआ था